बिजली एक मुनाफे का साधन नहीं, बल्कि जनता का अधिकार है। बिजली कर्मचारी देशव्यापी रूप से 9 जुलाई 2025 को निजीकरण के विरोध में हड़ताल पर जाने वाले हैं ।
बिजली विभाग का निजीकरण आज देश में एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। सरकार द्वारा बिजली वितरण और उत्पादन को निजी कंपनियों के हाथों सौंपने की प्रक्रिया को सुधार के नाम पर आगे बढ़ाया जा रहा है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव आम जनता और कर्मचारियों—दोनों पर पड़ रहे हैं।
जहां एक ओर उपभोक्ताओं को बिजली दरों में बढ़ोतरी, सब्सिडी समाप्त होने और सेवा की असमानता का डर सता रहा है, वहीं दूसरी ओर विभाग के कर्मचारियों को अपनी नौकरी, पेंशन और भविष्य की सुरक्षा को लेकर भारी चिंता है।
निजीकरण का मकसद भले ही सेवा में सुधार और घाटा कम करना बताया जा रहा हो, परंतु यदि यह प्रक्रिया बिना सामाजिक संवाद और जनहित को ध्यान में रखे की गई, तो यह आम लोगों के लिए सुविधाओं की जगह तकलीफ बन सकती है। इसलिए ज़रूरी है कि किसी भी निजीकरण से पहले जनता, कर्मचारी और नीति निर्माताओं के बीच खुली बातचीत और संतुलन की नीति अपनाई जाए।
बिजली विभाग के निजीकरण से सबसे ज़्यादा असर उन कर्मचारियों पर पड़ा है जिन्होंने वर्षों तक इस विभाग को अपने खून-पसीने से सींचा है। निजीकरण के फैसले ने उनकी नौकरी की स्थिरता, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा पर सीधा प्रहार किया है। जिन कर्मचारियों ने कठिन हालातों में, तूफान हो या बारिश, खंभों पर चढ़कर बिजली बहाल की — आज उन्हीं को डर है कि निजी कंपनियाँ उन्हें बाहर कर देंगी या ठेका कर्मचारी बनाकर न्यूनतम वेतन में काम लेंगी। उनके यूनियन अधिकारों में कटौती, हड़ताल पर रोक, और लक्ष्य आधारित दबाव ने मानसिक तनाव को बढ़ा दिया है। युवा कर्मचारियों को भी भविष्य में सरकारी नौकरी का सपना टूटता दिख रहा है। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक असुरक्षा का मुद्दा बन चुका है, जहाँ एक पूरी पीढ़ी को अपने अधिकारों और सम्मान की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
बिजली विभाग के निजीकरण का सबसे बड़ा असर आम जनता पर पड़ रहा है, खासकर गरीब, किसान, मजदूर और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों पर। निजी कंपनियाँ मुनाफे के उद्देश्य से काम करती हैं, जिससे बिजली दरों में लगातार बढ़ोतरी होती है। पहले जहाँ सरकार गरीबों और किसानों को सब्सिडी देकर राहत देती थी, अब उस पर खतरा मंडरा रहा है। शहरों में तो डिजिटल बिलिंग और स्मार्ट मीटर जैसी सुविधाएँ किसी हद तक लाभदायक हो सकती हैं, लेकिन गाँवों में रहने वाले लोगों के लिए यह तकनीकी परिवर्तन एक नई मुसीबत बन रहा है। बिजली कटौती, गलत बिलिंग, खराब सेवा और शिकायतों पर सुनवाई न होना अब आम बात हो गई है। जब आम आदमी पहले से ही महंगाई से परेशान है, तब बिजली को व्यापार बना देना उसकी मुश्किलों को और बढ़ा रहा है। इसलिए जरूरी है कि बिजली सेवा को मुनाफे का सौदा न बनाकर जनहित की जिम्मेदारी समझा जाए।
