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DB l भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई ने सुप्रीम कोर्ट के इतिहास के एक ऐसे अध्याय को उजागर किया है, जिसे वे “संस्थागत शर्मिंदगी का क्षण” मानते हैं। यह अध्याय वर्ष 1979 का है — ‘तुकाराम बनाम महाराष्ट्र राज्य’, जिसे देश भर में ‘मथुरा रेप केस’ के नाम से जाना जाता है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने दो पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया था, जिन्होंने एक आदिवासी लड़की मथुरा के साथ थाने में दुष्कर्म किया था। अदालत ने कहा था कि लड़की के शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं हैं, इसलिए यह संबंध “सहमति से” बनाए गए होंगे।

सीजेआई गवई ने कहा कि यह फैसला भारत के न्यायिक इतिहास के सबसे परेशान करने वाले क्षणों में से एक था — जब अदालत उस व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करने में असफल रही, जिसकी सुरक्षा ही उसका संवैधानिक दायित्व था। उन्होंने कहा कि यह फैसला न केवल न्यायपालिका की विफलता थी, बल्कि उस दौर की पितृसत्तात्मक सोच और सामाजिक पूर्वाग्रहों का प्रतिबिंब भी था।

जस्टिस गवई 30वें जस्टिस सुनंदा भंडारे मेमोरियल लेक्चर में बोल रहे थे, जहां उन्होंने इस फैसले को भारत के आपराधिक न्याय तंत्र में बदलाव की एक निर्णायक चेतावनी बताया। उन्होंने कहा कि यह फैसला देश की चेतना को झकझोर गया था। जनता, महिला संगठनों, छात्रों और कानूनी कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया। इन प्रदर्शनों से ही भारत में आधुनिक महिला अधिकार आंदोलन की नींव रखी गई।

इस आंदोलन के दबाव में सरकार को कानूनों में सुधार करने पड़े। ‘सहमति’ की परिभाषा को बदला गया, हिरासत में बलात्कार (custodial rape) के खिलाफ सुरक्षा कड़ी की गई, और महिलाओं की गवाही को नए सिरे से महत्व दिया गया। सीजेआई गवई ने कहा कि “इस मामले ने न्यायपालिका को जवाबदेह बनाया, और यह जनता की सतर्कता ही थी जिसने अदालतों को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया।”

उन्होंने कहा कि लैंगिक समानता की दिशा में भारत ने एक लंबी और असाधारण यात्रा तय की है। अदालतों ने कई बार समानता और गरिमा को संरक्षण देने वाले फैसले दिए, हालांकि कुछ अपवाद जैसे 1979 का निर्णय इस यात्रा के धब्बे हैं।

सीजेआई ने कहा — “न्यायपालिका की जवाबदेही केवल संविधान से नहीं, बल्कि जनता के संवाद और नागरिक समाज की सतर्कता से तय होती है।” उन्होंने जोर दिया कि सच्ची सामाजिक प्रगति तभी संभव है जब पुरुष सत्ता साझा करने को अपनी हार नहीं, बल्कि समाज की मुक्ति समझें।

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