DB l “घूस का रोग ग्राम व्यवस्था में गहराई तक पसरा” — परसवाड़ा में रिश्वतखोर सचिव की गिरफ्तारी ने खोली भ्रष्टाचार की जड़ें।
मध्यप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में फैले भ्रष्टाचार की गंध अब असहनीय होती जा रही है। गांवों के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये की योजनाएँ बनती हैं, लेकिन जब आम नागरिक किसी सरकारी सेवा या अनुमति के लिए पहुंचता है, तो उसे ‘सेवा शुल्क’ नहीं, ‘रिश्वत शुल्क’ चुकाना पड़ता है। इसका ताजा उदाहरण जनपद पंचायत परसवाड़ा से सामने आया, जहां ग्राम पंचायत खरपड़िया के सचिव और ग्राम पंचायत उकवा के प्रभारी सचिव योगेश हिरवाने को लोकायुक्त जबलपुर की टीम ने 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया।

शिकायतकर्ता अंकुश चौकसे ने शासन से प्राप्त भूमि पर मकान निर्माण की अनुमति (NOC) के लिए आवेदन दिया था, परंतु प्रभारी सचिव ने इसके बदले दो लाख रुपये की मांग की। पहली किश्त के रूप में 50 हजार रुपये लेते ही लोकायुक्त टीम ने छापा मारकर आरोपी को पकड़ा और आगे की कार्रवाई के लिए बैहर ले जाया गया।
दुखद यह है कि कार्रवाई होने के बाद भी प्रक्रियाओं की धीमी चाल भ्रष्ट अफसरों के लिए ढाल बन जाती है। निलंबन, बर्खास्तगी या सज़ा में महीनों नहीं, सालों लग जाते हैं। आरोपी जानते हैं कि जांच लंबी चलेगी — तब तक तनख्वाह, पद और प्रभाव सब बरकरार रहेगा। यही वजह है कि कई सरकारी कर्मचारी अब खुद को ‘कानून से ऊपर’ समझने लगे हैं।
घटना सिर्फ एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि ग्राम प्रशासन में पनप रही गहरी सड़ांध की ओर इशारा करती है। छोटे-छोटे कामों के लिए रिश्वत लेना अब सामान्य बात हो चुकी है। सवाल यह है कि आखिर ये कब तक चलेगा? सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन प्रशासनिक ईमानदारी का सवाल जस का तस खड़ा है। गांवों के सचिव, पटवारी, पंचायत अधिकारी — जो जनता के सबसे करीब हैं — वही अगर भ्रष्टाचार की जड़ बन जाएं, तो व्यवस्था का विश्वास कैसे टिकेगा?

यह समय केवल कार्रवाई का नहीं, बल्कि प्रणाली में सुधार का है। रिश्वत के हर मामले को तेज़ अदालतों में सुनवाई का विषय बनाकर छह महीने के भीतर सज़ा का प्रावधान हो, तभी भय और जवाबदेही पैदा होगी।
गांव का सचिव जब ‘सेवा’ के बजाय ‘सौदेबाज़ी’ करने लगे, तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं — लोकतंत्र के मूल मूल्य पर आघात है। अब इस रोग को जड़ से मिटाने की जरूरत है, वरना आने वाली पीढ़ियाँ ‘सिस्टम’ पर से भरोसा खो देंगी।
