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DB l ‘वंदे मातरम्’ आज़ादी की लड़ाई का वो मंत्र रहा है, जिसने करोड़ों भारतीयों में देशभक्ति की ज्वाला जगाई। 1875 में बंकिम चंद्र चटोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत उस दौर की उपज था, जब 1857 के बाद ब्रिटिश हुकूमत का दमन चरम पर था। यह गीत बाद में ‘आनंदमठ’ में शामिल हुआ और रवींद्रनाथ टैगोर ने इसकी धुन तैयार की, जिससे यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन का स्वर बन गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर कहा कि यह गीत केवल शब्द नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में कांग्रेस ने इसके कुछ महत्वपूर्ण अंश हटाकर इसकी “आत्मा को तोड़ने” का प्रयास किया, और यही देश के विभाजन की मानसिकता का बीज बना।

इस पर कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा कि यह फैसला स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर लिया गया था और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाना इतिहास के साथ अन्याय है। वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्कूलों और कॉलेजों में ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य करने की घोषणा कर दी, जिसके बाद यह मुद्दा और गरमा गया।

समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने कहा कि देशभक्ति जबरन नहीं थोपी जा सकती। उनका तर्क है कि संविधान ने राष्ट्रगान को अनिवार्य जबकि राष्ट्रगीत को स्वैच्छिक रखा है। इस बीच संसद में एक हल्का पल भी आया, जब विपक्षी सांसद के टोकने पर पीएम मोदी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “दादा तबीयत तो ठीक है न?”, जिससे सदन ठहाकों से गूंज उठा।

आज ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है — जहां सवाल यह नहीं कि गीत का सम्मान हो या नहीं, बल्कि यह कि देशभक्ति की भावना स्वाभाविक हो या आदेश से थोपी जाए।

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