DB l तमिलनाडु सरकार को सुप्रीम कोर्ट से झटका, दो विधेयकों पर याचिका खारिज…
तमिलनाडु सरकार को शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा जब शीर्ष अदालत ने उसकी उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें राष्ट्रपति को दो विधेयकों पर निर्णय नहीं लेने का निर्देश देने की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि “हम राष्ट्रपति को निर्णय लेने से रोकने वाला कोई आदेश पारित नहीं कर सकते।”
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब तमिलनाडु की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने तर्क दिया कि राज्यपाल ने मंत्रिपरिषद की सलाह की अवहेलना की है। याचिका में राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा दो विधेयकों — कलैगनार विश्वविद्यालय की स्थापना और तमिलनाडु शारीरिक शिक्षा एवं खेल विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक — को राष्ट्रपति के पास भेजने को ‘असंवैधानिक’ बताया गया था।

अदालत ने कहा कि इस मामले पर अंतिम निर्णय तब लिया जाएगा जब संविधान पीठ राष्ट्रपति संदर्भ (Presidential Reference) पर अपना फैसला सुना देगी। पीठ ने तमिलनाडु सरकार से कहा कि “आपको अधिकतम चार सप्ताह का इंतजार करना होगा,” और उम्मीद जताई कि 21 नवंबर (मुख्य न्यायाधीश गवई के सेवानिवृत्त होने से पहले) तक फैसला आ जाएगा।
सप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 11 सितंबर को इस मामले पर फैसला सुरक्षित रखा था। यह पीठ यह तय कर रही है कि क्या अदालत राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी देने या रोकने की कोई समय सीमा निर्धारित कर सकती है। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार के वकील अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि राज्यपाल किसी बिल की धारा-दर-धारा जांच कर उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते। रोहतगी ने तर्क दिया, “अगर राज्यपाल को संविधान की व्याख्या करनी है, तो उन्हें राजभवन में नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट में बैठना चाहिए।”
वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह कोई नई परंपरा नहीं है — 1950 से अब तक राज्यपाल ऐसे मामलों में विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेजते रहे हैं। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि 2015 से अब तक 6,942 विधेयकों में से केवल 381 को ही राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया है, जबकि बाकी को राज्यपालों ने स्वीकृति दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल तमिलनाडु सरकार से संयम बरतने को कहा है और संविधान पीठ का फैसला आने तक किसी भी हस्तक्षेप से इंकार किया है। अदालत ने कहा कि “फैसला आने में थोड़ा समय लगेगा, लेकिन तब तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।”
