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DB l सीजेआई सूर्यकांत बोले ,न्यायालय हर सरकारी फैसले की समीक्षा का मंच नहीं…

सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया में परमाणु ऊर्जा नीति से जुड़ी याचिका की सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश सूर्य कान्त ने नीतिगत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अदालतों को हर सरकारी नीति में दखल देने से बचना चाहिए और निर्णय लेते समय राष्ट्रीय हित तथा संभावित आशंकाओं के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

यह सुनवाई ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) अधिनियम, 2025’ के प्रावधानों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर हो रही थी। याचिकाकर्ता पूर्व नौकरशाह ईएएस शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण उपस्थित हुए। उन्होंने दलील दी कि अधिनियम के तहत परमाणु दुर्घटना की स्थिति में निजी कंपनियों की नागरिक देनदारी 3000 करोड़ रुपये तक सीमित कर दी गई है, जबकि किसी बड़े हादसे में नुकसान लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि देश को पर्याप्त ऊर्जा संसाधनों की आवश्यकता है। कोयला आधारित ऊर्जा को हतोत्साहित किया जा रहा है, जंगलों से समझौता संभव नहीं है और गैस संसाधन सीमित हैं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा विकास का एक महत्वपूर्ण विकल्प है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि हर नीति लंबे समय तक न्यायालयी विवादों में उलझी रहेगी तो बड़े परियोजनाएं प्रभावित होंगी और निवेशकों में असुरक्षा की भावना पैदा होगी।

पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि ऊर्जा नीति तय करना सरकार का अधिकार है और न्यायालय केवल उसकी संवैधानिक वैधता की जांच करेगा। अदालत ने याचिकाकर्ता से अमेरिका, यूरोप और जापान के परमाणु दायित्व कानूनों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करने को कहा है।

मामले को संवेदनशील बताते हुए न्यायालय ने कहा कि इस पर विस्तृत सुनवाई आवश्यक है। अगली सुनवाई अगले महीने निर्धारित की गई है।

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