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DB l टीईटी अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: बड़ी पीठ करेगी सुनवाई, अल्पसंख्यक संस्थानों पर छूट पर भी उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को अनिवार्य बनाने के अपने फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं को अब बड़ी पीठ के पास भेजने का फैसला किया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी प्रश्न हैं, जिनका निपटारा बड़ी पीठ द्वारा किया जाना चाहिए।

यह फैसला उस पृष्ठभूमि में आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को दिए गए निर्णय में कहा था कि 2011 के बाद नियुक्त सभी शिक्षकों को दो वर्षों के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य होगा, अन्यथा उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति लेनी होगी। सेवानिवृत्ति के निकट शिक्षकों को छूट दी गई है, लेकिन पदोन्नति के लिए टीईटी अनिवार्य रहेगा।

याचिकाओं में सवाल उठाया गया है कि टीईटी की अनिवार्यता केवल गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू होती है, जबकि अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे छूट मिली हुई है। यह आरटीई अधिनियम की धारा 1(4) और 1(5) के तहत संभव है, जिसकी संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह छूट संविधान के अनुच्छेद 14, 21ए और अन्य मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है, क्योंकि इससे समान शिक्षा के अधिकार से समझौता होता है। कोर्ट ने माना कि यह मुद्दा पहले से ही चीफ जस्टिस के समक्ष लंबित है, और इसी कारण याचिका को बड़ी पीठ के लिए आगे बढ़ाया गया है। अब यह देखना अहम होगा कि सुप्रीम कोर्ट की विस्तृत पीठ इस महत्वपूर्ण शिक्षा नीति के मामले में क्या फैसला देती है।

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