DB l देश में घर खरीदने वालों के लिए सुरक्षा कवच माने जाने वाले रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत की सख्त टिप्पणियों से रियल एस्टेट सेक्टर में हलचल मच गई है। शीर्ष अदालत ने यहां तक कहा कि यदि RERA अपने मूल उद्देश्य—घर खरीदारों की सुरक्षा—को पूरा नहीं कर पा रही है और डिफॉल्टर बिल्डरों को राहत दे रही है, तो इसके अस्तित्व पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ हिमाचल प्रदेश सरकार बनाम नरेश शर्मा मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने टिप्पणी की कि राज्यों को आत्ममंथन करना चाहिए कि RERA आखिर किसके हित में काम कर रही है। अदालत ने चिंता जताई कि कई मामलों में आम खरीदारों को समय पर राहत नहीं मिलती, जबकि लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते बिल्डरों को लाभ मिल जाता है। पीठ ने कहा कि जिन लोगों के हितों की रक्षा के लिए RERA बनाई गई थी, वे खुद को निराश और हताश महसूस कर रहे हैं।
मामला हिमाचल प्रदेश में RERA कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने से जुड़ा है। राज्य सरकार ने प्रशासनिक कारणों और क्षेत्रीय विकास की नीति के तहत यह निर्णय लिया था, जिस पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करते हुए राज्य सरकार को कार्यालय शिफ्ट करने की अनुमति दी, हालांकि यह स्पष्ट किया कि RERA और उसकी अपीलीय ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली प्रभावित नहीं होनी चाहिए और लंबित मामलों की सुनवाई नियमित रूप से जारी रहे।

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि RERA में सेवानिवृत्त अधिकारियों की नियुक्ति पर अदालत ने सवाल उठाए। सीजेआई ने टिप्पणी की कि कई राज्यों में ऐसी संस्थाएं “रिहैबिलिटेशन सेंटर” बनती जा रही हैं। साथ ही, अपील की सुविधा प्रभावित न हो, इसके लिए शिमला के मुख्य जिला जज से अपील की शक्ति धर्मशाला के मुख्य जिला जज को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया।
गौरतलब है कि RERA कानून 2016 में पारदर्शिता लाने और बिल्डरों की मनमानी रोकने के उद्देश्य से लागू किया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने इस बात पर बहस छेड़ दी है कि क्या यह संस्था अपने मूल लक्ष्य से भटक चुकी है।
