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DB l सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए रणनीतिक रक्षा समझौते ने पूरे क्षेत्र में हलचल मचा दी है। इस डील में पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा सहयोग की बात कही गई है, जिससे कयास लगाए जा रहे हैं कि इसमें पाकिस्तान की परमाणु क्षमता भी शामिल हो सकती है। सऊदी शाही परिवार के करीबी विश्लेषक अली शिहाबी ने इसे “समझौते का अभिन्न अंग” बताया, वहीं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का बयान कि “जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान अपनी परमाणु क्षमताएं सऊदी को देगा” ने बहस और तेज कर दी। हालांकि बाद में उन्होंने अपने बयान से पल्ला झाड़ लिया।

पाकिस्तान के पास अनुमानतः 170 परमाणु बम हैं। सवाल यह है कि क्या वह सऊदी को अपनी ‘परमाणु छतरी’ देगा? अब तक ऐसी मिसाल सिर्फ अमेरिका और रूस की ही रही है। लाहौर विश्वविद्यालय के रणनीति विशेषज्ञ सैयद अली जिया जाफरी ने साफ किया कि पाकिस्तान का परमाणु सिद्धांत पूरी तरह भारत-केंद्रित है और सऊदी को परमाणु संरक्षण देने का कोई सबूत नहीं है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक मानते हैं कि ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ ही इस समझौते का हिस्सा हो सकती है।

सऊदी के लिए यह समझौता इसलिए अहम है क्योंकि क़तर पर ईरान और इजरायल के हालिया हमलों के बाद अमेरिका पर उसका भरोसा डगमगा गया है। वहीं पाकिस्तान के लिए इसमें आर्थिक सहयोग की संभावना है। दशकों से पाकिस्तान ने सऊदी को सैनिक और प्रशिक्षण दिया है, लेकिन अब म्यूचुअल डिफेंस क्लॉज का मतलब होगा कि अगर सऊदी किसी संघर्ष में फंसेगा तो पाकिस्तान को भी उतरना पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पाकिस्तान को यमन या ईरान जैसे विवादों में खींच सकता है, जबकि वह पहले से ही आतंकी हमलों और आर्थिक संकट से जूझ रहा है।

भारत को लेकर सवाल भी उठे। सऊदी अरब भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है और उसके साथ गहरे आर्थिक रिश्ते रखता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सऊदी की बहु-गठबंधन कूटनीति भारत के साथ संबंध बिगाड़ने की दिशा में नहीं जाएगी। कनिका राखरा और एहतेशाम शाहिद जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील भारत-पाक संघर्ष से ज्यादा मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति के मद्देनज़र है।

हालांकि पाकिस्तान के भीतर चिंताएं बढ़ी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस डील से पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और कमजोर हो सकती है और वह सीधे इजरायल समेत कई ताकतों के निशाने पर आ सकता है। इतिहास गवाह है कि ‘वॉर ऑन टेरर’ में अमेरिका का साथ देकर पाकिस्तान ने भारी कीमत चुकाई थी। अब सवाल यह है कि क्या इस डील से वह फिर किसी नए दलदल में फंसने जा रहा है।

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