DB l रियाद में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक अहम रणनीतिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते को नाटो शैली का बताया जा रहा है, क्योंकि इसमें प्रावधान है कि यदि किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों पर हमला माना जाएगा। पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की मौजूदगी इस डील को और ज्यादा संवेदनशील बनाती है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह समझौता खाड़ी क्षेत्र में बदलते सुरक्षा समीकरणों का परिणाम है। हाल ही में इजरायल द्वारा कतर की राजधानी दोहा में हमले और बढ़ते तनाव ने खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क कर दिया है। परंपरागत रूप से अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर निर्भर सऊदी अरब अब विकल्प तलाश रहा है। पाकिस्तान के साथ यह गठबंधन उसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।
भारत के लिए यह समझौता चिंता का विषय है। पाकिस्तान पहले ही भारत का चिर-प्रतिद्वंद्वी रहा है और यदि भविष्य में कोई सैन्य टकराव होता है, तो सऊदी अरब भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान का साथ दे सकता है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सरकार को इस डील की जानकारी पहले से थी और अब इसके क्षेत्रीय व वैश्विक प्रभावों का गहन अध्ययन किया जाएगा। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता पाकिस्तान के लिए उतना लाभकारी साबित नहीं होगा, जितना वह समझ रहा है। यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को लंबे समय से जंग झेलनी पड़ी है। इस डील के बाद पाकिस्तान को भी सऊदी की लड़ाइयों में शामिल होना पड़ सकता है। आलोचकों का कहना है कि इस्लामाबाद खुद को सऊदी की “किराये की सेना” बना बैठा है।
इस समझौते ने पुराने सवालों को भी हवा दी है कि क्या सऊदी अरब पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का अप्रत्यक्ष सहयोगी रहा है। अमेरिका के पूर्व राजनयिक जलमय खलीलजाद ने कहा है कि यह डील औपचारिक संधि नहीं है, लेकिन इसके राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ गहरे हैं।
कुल मिलाकर, यह समझौता मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को नया मोड़ देता है। भारत को अपनी कूटनीतिक और सैन्य रणनीति में संभावित बदलावों के लिए तैयार रहना होगा।
