DB l यह लाइन उन किसानों की पीड़ा बयां करती है, जो अपनी ही ज़मीन का हक़ पाने के लिए सरकारी कर्मचारियों के सामने गिड़गिड़ाते हैं। डवाली खुर्द निवासी ओंकार राठौर और कोहका गाँव के राजाराम बिलागर जैसे किसानों की आवाज़ उस सिस्टम की नाकामी को उजागर करती है, जो आमजन की सेवा के लिए बनी थी लेकिन अब लूट का ज़रिया बन गई है।

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका सबसे ताज़ा और ज्वलंत उदाहरण हालिया दिनों की घटनाएँ हैं। एक ओर नेपानगर तहसील में महिला पटवारी प्रियंका ठाकुर को तीन हजार रुपये की रिश्वत लेते लोकायुक्त टीम ने रंगेहाथ पकड़ लिया, तो दूसरी ओर डिंडौरी जिले में पटवारी रामकिशोर चावले चार हजार रुपये की घूस लेते ईओडब्ल्यू के जाल में फँस गए। दोनों ही मामले एक ही कहानी कहते हैं—“जनता की मजबूरी, पटवारियों की मनमानी।”राजस्व विभाग में बैठे ये ‘नन्हे बादशाह’ अपनी कुर्सी और कलम के बल पर किसानों को परेशान करते हैं। नामांतरण, ऋण पुस्तिका या किसी भी राजस्व कार्य के लिए घूस की माँग आम बात बन चुकी है। “बिना चढ़ावे का काम नहीं होगा”—यह हकीकत गाँव-गाँव में चर्चा का विषय है।
“खेत में पसीना बहाने वाला किसान रिश्वत में रोता है, और कुर्सी पर बैठा पटवारी जनता को नोचता है।”
लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू लगातार कार्रवाई कर रही हैं। एक पखवाड़े में ही दो-दो पटवारी रिश्वत लेते पकड़े गए। लेकिन यह भी सच है कि “कार्रवाई बड़ी है, पर असर छोटा।” घूसखोरी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि एक गिरफ़्तारी के बाद दूसरे ही दिन नई शिकायतें सामने आ जाती हैं।

जनता सवाल पूछ रही है—क्या हमारी ही ज़मीन पर हमारा हक़ पाने के लिए रिश्वत देना अब ‘नया सामान्य’ बन चुका है? और क्या सिस्टम कभी उन असली जिम्मेदारों तक पहुँचेगा, जो ऐसे भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं? भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएँ कागज़ों पर मजबूत दिखती हैं, लेकिन ज़मीन पर अब भी कमज़ोर साबित हो रही हैं। जब तक पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं बढ़ेगी, तब तक “घूसखोरी की यह ज़मीन” हर किसान के सपनों को लीलती रहेगी।
