DB l केंद्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार से जुड़ी देश की सबसे बड़ी योजना में बड़ा बदलाव करते हुए महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA) का नाम बदलकर ‘पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना’ करने का फैसला किया है। शुक्रवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। इसके साथ ही योजना के तहत मिलने वाले गारंटीशुदा रोजगार के दिनों की संख्या को भी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक यह बदलाव 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होने वाले 16वें वित्त आयोग के पुरस्कारों से पहले की तैयारी का हिस्सा है।
मनरेगा, जिसे MGNREGA या NREGA के नाम से जाना जाता है, ग्रामीण भारत की रीढ़ मानी जाने वाली योजना है। इसे वर्ष 2005 में लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को रोज़गार की कानूनी गारंटी देकर उनकी आजीविका को सुरक्षित करना है। इस योजना के तहत हर वित्तीय वर्ष में ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को बिना किसी हुनर वाले काम के लिए कम से कम 100 दिनों की मजदूरी का अधिकार दिया जाता है। अब इसे बढ़ाकर 125 दिन किए जाने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने और आय में स्थिरता आने की उम्मीद जताई जा रही है।

सरकार का कहना है कि यह फैसला ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा और महंगाई के दौर में गरीब व जरूरतमंद परिवारों को अतिरिक्त सहारा देगा। हालांकि, इस निर्णय पर सियासी घमासान भी शुरू हो गया है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने नाम बदलने पर सवाल उठाते हुए कहा कि महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी योजना का नाम बदलने का तर्क समझ से परे है और इससे सरकारी संसाधनों का फिजूल खर्च होगा। उन्होंने कहा कि नाम बदलने से स्टेशनरी, दस्तावेज़ और कार्यालयी ढांचे पर अतिरिक्त खर्च आता है, जिसका कोई ठोस लाभ नहीं दिखता।
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भी सरकार पर हमला करते हुए कहा कि मोदी सरकार ने कांग्रेस द्वारा शुरू की गई 32 योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें अपना बताने की कोशिश की है। वहीं शिवसेना (UBT) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे “ध्यान भटकाने की राजनीति” करार दिया और कहा कि फ्रस्ट्रेशन के कारण ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं।
मनरेगा दुनिया के सबसे बड़े वर्क गारंटी प्रोग्राम्स में से एक है। 2022-23 तक इसके तहत करीब 15.4 करोड़ सक्रिय श्रमिक पंजीकृत थे, जिनमें कम से कम एक-तिहाई महिलाएं हैं। योजना का सबसे अहम पहलू यह है कि काम मांगने के 15 दिनों के भीतर रोजगार देना कानूनी रूप से अनिवार्य है, अन्यथा बेरोज़गारी भत्ता देना होता है। नाम बदलने और कार्यदिवस बढ़ाने के फैसले के साथ यह योजना एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है।
