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ड्रोन का उपयोग आधुनिक सेना में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आया है। यह बिना पायलट के उड़ने वाला यंत्र है जिसे दूर से नियंत्रित किया जाता है। सेना में इसका प्रमुख उपयोग जासूसी, निगरानी, और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जाता है।

तालिबान ने वास्तव में एक खतरनाक आत्मघाती ड्रोन सेना (suicide drone army) तैयार कर ली है, जिसका हाल ही में परीक्षण हुआ है।
तालिबान ने अफगानिस्तान में एक पूर्व ब्रिटिश एयरबेस को अपनी ड्रोन परीक्षण साइट में बदल दिया है। इसी के आसपास उन्होंने अमेरिका द्वारा छोड़े गए बेस को ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में तब्दील करना भी शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग से यह ड्रोन मॉडल तैयार किए जा रहे हैं, जो आत्मघाती हमले (suicide missions) के लिए डिज़ाइन हैं।

पाकिस्तान इन ड्रोनों को संभावित खतरा मान रहा है। ये ड्रोन निशाने पर लगाने के लिए बनाए गए हैं, जिससे वे इलाके में जासूसी और हमले दोनों कर सकते हैं। पड़ोसी देशों के लिए विशेषकर पाकिस्तान के लिए यह सुरक्षा चुनौती उत्पन्न कर रहा है। अमेरिका और NATO को चिंता है कि ये ड्रोन निर्यात या अन्य आतंकवादी समूहों को उपयोग के लिए प्रस्तावित हो सकते हैं।

तालिबान का यह कदम एक व्यापक आत्मनिर्भर और आत्मघाती ड्रोन शक्ति का गठन है, जिसने न केवल उनकी हमलावर क्षमताओं को बढ़ाया है, बल्कि यह क्षेत्रीय अस्थिरता का एक नया आयाम भी जोड़ता है।

इसके माध्यम से सैनिकों की जान जोखिम में डाले बिना दुश्मन के क्षेत्र में जानकारी इकट्ठा की जा सकेगी। इसके अलावा, ड्रोन से सीमाओं पर निगरानी, युद्ध क्षेत्र में आवश्यक सामग्री पहुंचाना और आपदा के समय राहत कार्यों में सहायता जैसे काम भी किए जसकेंगे ।

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