DB l जबलपुर का नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार वजह है अस्पताल के वार्डों में रखी गईं दान पेटियाँ। सवाल यह उठता है कि आखिर इन पेटियों में डाला गया पैसा किसके लिए है और जाता कहाँ है? सरकारी अस्पताल में, जहां गरीब और मध्यम वर्गीय लोग सस्ते इलाज की उम्मीद में आते हैं, वहां इलाज से पहले दान वसूलना किसी अवैध वसूली से कम नहीं।
गरीब तबका, जो पहले ही दवा, जांच और इलाज के खर्च से जूझ रहा है, उनसे दान लेना सीधा शोषण है। सरकारी फंड से चलने वाले अस्पतालों में यदि सही व्यवस्था और सुविधाएं होतीं, तो मरीजों से दान पेटी के नाम पर रकम निकालने की नौबत ही क्यों आती? सवाल यह भी है कि इन पेटियों को लगाने का फैसला किसने लिया? क्या प्रशासन की अनुमति से? या यह किसी “आय का नया स्रोत” है, जिसका हिसाब कभी पब्लिक तक नहीं पहुंचता?
इससे बड़ा सवाल और शर्मनाक हकीकत यह है कि अस्पताल प्रबंधन और प्रशासन दोनों ही चुप हैं। सरकार भी इस पर आंख मूंदे बैठी है। मरीजों और उनके परिजनों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनसे “दान” के नाम पर पैसा वसूलना, सीधा-सीधा भ्रष्टाचार और अवैध वसूली है।
अगर यह पैसा सुविधाओं पर खर्च हो रहा है, तो फिर वार्डों में गंदगी, टूटे-बिखरे बेड और दवाइयों की कमी क्यों है? और अगर यह पैसा जेबों में जा रहा है, तो यह अपराध है।जबलपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल पर यह आरोप अब और दब नहीं सकते। वार्डों में पड़ी दान पेटियाँ जनता से वसूली का खुला सबूत हैं। सवाल साफ है – क्या इलाज का हक़ भी अब दान की पेटी में बंद हो गया है?
