DB l देश में महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक भागीदारी को लेकर बहस तेज है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी चिंताजनक है। महिलाओं को आज भी रोजगार और आय के मामले में पुरुषों के मुकाबले बराबरी नहीं मिल पा रही है। आंकड़े बताते हैं कि आधी आबादी होने के बावजूद महिलाएं आर्थिक रूप से पीछे हैं और उन्हें हर स्तर पर असमानता का सामना करना पड़ रहा है।
Periodic Labour Force Survey (PLFS) 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) पुरुषों में 59.1% है, जबकि महिलाओं में यह सिर्फ 30.7% है। यानी हर 10 में से केवल 3 महिलाएं ही काम कर रही हैं या काम की तलाश में हैं। वहीं वर्कर पॉपुलेशन रेशो (WPR) में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है—पुरुषों का WPR 57.2% है, जबकि महिलाओं का केवल 29.8%।
बेरोजगारी दर कुल मिलाकर समान (3.1%) दिखती है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब है। शहरों में पुरुषों की बेरोजगारी दर 4.2% है, जबकि महिलाओं में यह 6.4% तक पहुंच जाती है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि नौकरी पाने में महिलाओं को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

आय के मामले में भी महिलाओं के साथ बड़ा अंतर देखने को मिलता है। 2025 में वेतनभोगी पुरुषों की औसत मासिक आय 24,217 रुपये है, जबकि महिलाओं की आय केवल 18,353 रुपये है। यानी एक ही काम के लिए महिलाओं को औसतन करीब 6,000 रुपये कम मिलते हैं। हालांकि महिलाओं की आय में वृद्धि दर (7.2%) पुरुषों (5.8%) से अधिक रही है, फिर भी यह अंतर अभी भी काफी बड़ा है।
स्वरोजगार और दिहाड़ी मजदूरी में भी यही तस्वीर नजर आती है। खुद का काम करने वाले पुरुष औसतन 17,914 रुपये कमाते हैं, जबकि महिलाएं सिर्फ 6,374 रुपये ही कमा पाती हैं। दिहाड़ी मजदूरी में पुरुषों को औसतन 455 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, जबकि महिलाओं को केवल 315 रुपये ही मिलते हैं।
ये आंकड़े साफ दिखाते हैं कि सिर्फ राजनीति में आरक्षण देना ही काफी नहीं है। असली जरूरत महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और समान वेतन के अवसर देने की है। जब तक कार्यस्थल पर बराबरी नहीं मिलेगी, तब तक सशक्तिकरण अधूरा ही रहेगा।
