DB l जबलपुर। कभी बांस से सूपा और टोकनी बनाकर परिवार का भरण-पोषण करने वाली कुण्डम विकासखंड के सिलाइया गांव की आदिवासी महिलाएं आज सफलता और आत्मनिर्भरता की नई कहानी गढ़ रही हैं। अपने पारंपरिक कौशल को आधुनिक डिजाइन और बाजार की मांग से जोड़कर इन महिलाओं ने न केवल अपनी आय बढ़ाई है, बल्कि समाज में एक नई पहचान भी बनाई है।
नाबार्ड के सहयोग और लोक कल्याण भूमिका समिति के प्रयासों से गांव की 90 महिलाओं को आजीविका एवं उद्यम विकास कार्यक्रम के तहत विशेष प्रशिक्षण दिया गया। इस प्रशिक्षण ने उनकी कला को नया आयाम दिया। अब ये महिलाएं केवल सूपा और टोकनी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बांस से आकर्षक फ्लावर पॉट, सजावटी जहाज, थ्री-डी ग्रीटिंग कार्ड, टेबल डेकोरेशन आइटम, कुर्सियां और टेबल जैसी आधुनिक सजावटी वस्तुएं तैयार कर रही हैं।

इन उत्पादों की मांग स्थानीय बाजार से निकलकर जबलपुर, भोपाल और छिंदवाड़ा जैसे बड़े शहरों तक पहुंच चुकी है। विभिन्न मेलों और प्रदर्शनियों में इनके स्टॉल लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। महिलाओं की मेहनत और रचनात्मकता ने बांस को आम उपयोग की वस्तु से एक आकर्षक हस्तशिल्प उत्पाद में बदल दिया है।
नाबार्ड की जिला विकास प्रबंधक देविना मेहरोत्रा के अनुसार, लगभग 200 रुपये कीमत के एक बांस से तैयार उत्पाद 700 से 800 रुपये तक बिक रहे हैं। वहीं दो बांस से बनी कुर्सी और टेबल की कीमत 2 से 3 हजार रुपये तक मिल रही है। इससे महिलाओं की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

महिलाओं के प्रशिक्षण और क्षमता विकास के लिए नाबार्ड ने 10 लाख रुपये की फंडिंग उपलब्ध कराई। इसके साथ ही उन्हें बाजार से जोड़ने, ग्राहकों से संवाद स्थापित करने और उत्पादों की प्रस्तुति की भी ट्रेनिंग दी गई।
आज सिलाइया की महिलाएं केवल हस्तशिल्प नहीं बना रहीं, बल्कि अपने आत्मविश्वास, संघर्ष और उद्यमिता से ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का एक प्रेरक मॉडल प्रस्तुत कर रही हैं। उनकी सफलता यह साबित करती है कि अवसर और सही मार्गदर्शन मिलने पर गांव की महिलाएं भी विकास की नई ऊंचाइयों को छू सकती हैं।
