DB l फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से उनकी मुलाकात को लेकर देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक विश्वास की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्षों के कारण भारत के मित्र देशों को जान-माल का नुकसान हुआ है और कई भारतीय नागरिकों ने भी अपनी जान गंवाई है। साथ ही उन्होंने समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा को वैश्विक जिम्मेदारी बताया।

हालांकि विपक्ष ने प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेताओं का आरोप है कि हाल ही में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नागरिकों की मौत के बावजूद प्रधानमंत्री ने अमेरिका का नाम लेने से परहेज किया। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इसे भारतीय नागरिकों के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए प्रधानमंत्री की आलोचना की। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी अमेरिका के समक्ष भारत का कड़ा विरोध दर्ज न कराने पर सवाल उठाए।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का एक हिस्सा अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रसिद्ध कथन “Trust but Verify” यानी “भरोसा करो, लेकिन परखो भी” का उल्लेख किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की मौजूदगी में इस ऐतिहासिक कथन का प्रयोग एक संतुलित कूटनीतिक संदेश था। यह वाक्य शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच विश्वास और सत्यापन की नीति का प्रतीक माना जाता है।

G7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए विश्वास, सहयोग और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं विपक्ष की आलोचना और कूटनीतिक संकेतों को लेकर यह संबोधन देश और दुनिया में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
