DB l राहुल गांधी 17 अगस्त से बिहार में “मतदाता अधिकार यात्रा” शुरू करने जा रहे हैं।
बिहार में चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होने के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। आयोग ने दावा किया है कि ड्राफ्ट सूची पर 15 दिन पूरे होने के बाद भी किसी भी राजनीतिक दल ने औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार अब तक कुल 28,370 दावे और आपत्तियां दर्ज हुई हैं, जिनमें से 857 का निपटारा किया जा चुका है।
इस पूरी प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग और सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। तृणमूल कांग्रेस सांसद साकेत गोखले और महागठबंधन नेताओं का आरोप है कि यह कवायद बड़ी संख्या में वोटरों के नाम काटने और उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े करने की साजिश है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि आयोग ने आधार, पैन और ड्राइविंग लाइसेंस को नागरिकता का सबूत मानने से इनकार कर दिया है, जबकि जन्म प्रमाणपत्र को प्रमुख दस्तावेज के तौर पर रखा गया है। लेकिन समस्या यह है कि लगभग 20-25% भारतीयों के पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं है। इससे लाखों लोगों के मताधिकार पर संकट मंडरा रहा है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी 17 अगस्त से बिहार में “मतदाता अधिकार यात्रा” शुरू करने जा रहे हैं। इस यात्रा का उद्देश्य कथित वोट चोरी के खिलाफ आवाज उठाना और मतदाता सूची की पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। इस यात्रा में बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव सहित महागठबंधन के कई बड़े नेता भी शामिल होंगे। यह यात्रा कई जिलों से होकर गुजरेगी और 1 सितंबर को पटना के गांधी मैदान में विशाल रैली के साथ संपन्न होगी।
इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में अहम आदेश दिया है। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि सभी नाम विलोपनों का स्पष्ट कारण दर्ज किया जाए और आधार कार्ड को वैध सहायक दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया जाए। भाकपा (माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने इस आदेश का स्वागत किया और कहा कि यह उनकी आशंकाओं को सही साबित करता है। उन्होंने मांग की कि आयोग को बूथ और प्रखंड स्तर पर शिकायत-निवारण और त्रुटि-सुधार शिविर आयोजित करने चाहिए ताकि प्रभावित मतदाताओं को राहत मिल सके।
स्थिति इतनी गंभीर है कि मंटू पासवान जैसे मतदाता, जिन्हें गलती से “मृत” घोषित कर दिया गया था, अब दोबारा सूची में शामिल हुए हैं। लेकिन 35 लाख प्रवासी मजदूरों के नाम सूची से हटाए जाने पर बड़ा सवाल खड़ा है। आलोचकों का कहना है कि सुधार की जिम्मेदारी उन अधिकारियों पर डाली जानी चाहिए जिन्होंने ये गलतियां की हैं, न कि पीड़ित मतदाताओं पर।
कुल मिलाकर, SIR प्रक्रिया ने बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में राहुल गांधी की यात्रा और महागठबंधन की रैली से यह मुद्दा और ज्यादा गरमाने की संभावना है।
