DB l पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सियासी समीकरण अचानक बदल गए हैं। असदुद्दीन ओवैसी ने हुमायूं कबीर की पार्टी से गठबंधन तोड़ दिया है, जिसके बाद चुनावी माहौल और भी गरमा गया है। यह फैसला उस समय आया जब हुमायूं कबीर से जुड़ा एक कथित वीडियो वायरल हुआ, जिसमें करोड़ों रुपये की डील और बीजेपी नेताओं से संपर्क की बातें सामने आईं। हालांकि कबीर ने इसे एआई जनरेटेड वीडियो बताया, लेकिन विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा।

बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जो सत्ता की कुंजी माने जाते हैं। ओवैसी और कबीर का गठबंधन इन्हीं वोटों के सहारे बड़ा उलटफेर करने की तैयारी में था, लेकिन गठबंधन टूटने से यह समीकरण बिखर गया है। इसका सीधा फायदा ममता बनर्जी को मिल सकता है, क्योंकि मुस्लिम वोटों के बंटवारे का खतरा अब काफी हद तक कम हो गया है।

टीएमसी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हुए दोनों नेताओं पर बीजेपी से सांठगांठ के आरोप लगाए हैं। वहीं अन्य दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं—आरजेडी ने इसे सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया बताया, जबकि जेडीयू ने इसे “राजनीतिक मार्केटिंग” का नया तरीका कहा। शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने भी ओवैसी पर बीजेपी को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया।
गठबंधन टूटने से बंगाल में त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना कमजोर पड़ी है। अब मुकाबला सीधे तौर पर टीएमसी और विपक्षी दलों के बीच सिमटता दिख रहा है। ऐसे में ‘M फैक्टर’ यानी मुस्लिम वोटों का एकजुट होना ममता बनर्जी के लिए चुनावी संजीवनी साबित हो सकता है।
