स्विस नेशनल बैंक (SNB) द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा की गई राशि तीन गुना बढ़कर 3.5 अरब स्विस फ्रैंक (लगभग ₹37,600 करोड़) हो गई है। यह वृद्धि 2023 में दर्ज की गई 1.04 अरब स्विस फ्रैंक की तुलना में तीन गुना से अधिक है, जो उस समय चार वर्षों का न्यूनतम स्तर था।
इस बढ़ोतरी के पीछे स्थानीय शाखाओं और अन्य वित्तीय संस्थानों के माध्यम से जमा धन में आई बड़ी वृद्धि को जिम्मेदार माना जा रहा है। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि प्रत्यक्ष कस्टमर अकाउंट की राशि में महज़ 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो अब 34.6 करोड़ स्विस फ्रैंक (लगभग ₹3,675 करोड़) हो गई है — यह कुल जमा धन का केवल एक-तिहाई हिस्सा है।
स्विट्जरलैंड के केंद्रीय बैंक की रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि ये आंकड़े कथित ‘काले धन’ को नहीं दर्शाते हैं। स्विस सरकार बार-बार यह दोहराती रही है कि वह कर चोरी के खिलाफ भारत की लड़ाई में साथ है और काले धन की परिभाषा को स्विट्जरलैंड अलग तरीके से देखता है।
यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब भारत में विदेशी खातों में जमा कथित काले धन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस छिड़ी रहती है। हालांकि, सिर्फ स्विस बैंकों में जमा रकम को काला धन कहना उचित नहीं, लेकिन यह जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि इतनी बड़ी राशि किन स्रोतों से और किस प्रयोजन से बाहर भेजी जाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले और उसके तुरंत बाद स्विस बैंकों में जमा काले धन को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। यह मुद्दा उस समय भारतीय जनता पार्टी की रणनीति का अहम हिस्सा था, जिससे जनता में जबरदस्त प्रभाव पड़ा।
चुनाव प्रचार के दौरान कई भाजपा नेताओं ने कहा था कि “अगर स्विस बैंकों में जमा काला धन वापस लाया गया तो हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपये आ सकते हैं।” यह बात को बाद में पार्टी नेताओं ने “चुनावी अलंकार” बताया।
नरेंद्र मोदी ने कई रैलियों में कहा था: “हमारी सरकार बनी तो हम विदेशों में जमा सारा काला धन भारत लाएँगे और उसे देश के विकास में लगाएंगे।”
सरकार बनने के बाद मोदी कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत काले धन पर एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। इसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायाधीश एम. बी. शाह को दी गई थी। मोदी सरकार ने स्विट्जरलैंड समेत कई देशों के साथ सूचना आदान-प्रदान (Automatic Exchange of Information) के समझौते किए ताकि बैंक खातों की जानकारी मिल सके। 2019 से यह प्रक्रिया लागू भी हुई, और भारत को कुछ खातों की जानकारी मिलने लगी।
HSBC, Panama Papers, और Paradise Papers जैसे लीक हुए दस्तावेज़ों में जिन भारतीयों के नाम सामने आए, उनके खिलाफ आयकर विभाग और ईडी ने जांच की।
आलोचकों का कहना है कि: जितना काला धन वापस लाने का वादा किया गया था, वह अब तक पूरी तरह नहीं निभाया गया।
“15 लाख” का वादा मिथक बन गया और इसे लेकर जनता के बीच भ्रम भी फैला।
वहीं सरकार का कहना है कि: विदेशों में काले धन को रोकने के लिए कानूनी सुधार और वैश्विक सहयोग लगातार मजबूत किया गया है।
नरेंद्र मोदी ने स्विस बैंकों और काले धन को लेकर बेहद मजबूत वादे किए थे, जिसने आम जनता के बीच उम्मीदें और भावनाएं जगाईं। कुछ कदम जरूर उठाए गए, लेकिन वादों की तुलना में परिणाम आंशिक ही कहे जा सकते हैं।
अब सरकार के पास कूटनीतिक समझौते, वित्तीय निगरानी तंत्र, और सख्त कानूनों का बड़ा ढांचा है। यदि वह चाहे, तो FATF, OECD, और स्विस बैंकिंग ट्रांसपेरेंसी समझौते के तहत सटीक कार्रवाई कर सकती है। अब भारत को Automatic Exchange of Information (AEOI) के तहत हर साल विदेशी
खातों की जानकारी मिल रही है।
इससे सरकार को जमा राशियों, नामों, ट्रांजैक्शन हिस्ट्री तक पहुँचने में आसानी हो रही है। काला धन भारत में एक भावनात्मक मुद्दा बन चुका है, और नरेंद्र मोदी जानते हैं कि इस विषय पर कोई निर्णायक कदम उनकी छवि को और मजबूत कर सकता है।
कानूनी सीमाएँ और प्रूफ की आवश्यकता स्विस बैंक में खाता होना अपने-आप में अपराध नहीं है। अगर व्यक्ति ने उसे डिक्लेयर किया है, तो वह कानूनी है। पर जो पैसा अनडिक्लेयर या टैक्सचोरी से है, उस पर ही कार्रवाई हो सकती है — और इसके लिए पुख्ता सबूत चाहिए।
स्विट्ज़रलैंड भारत को सूचनाएँ देता है, परंतु “काले धन” की भारतीय परिभाषा को वह नहीं मानता। इसलिए सभी जानकारियाँ तुरंत नहीं मिलतीं, और कई केस “पेंडिंग” में ही रह जाते हैं।
नरेंद्र मोदी आने वाले समय में स्विस बैंकों या विदेशी खातों पर कोई ठोस, प्रतीकात्मक या कानूनी कदम उठा सकते हैं —
विशेषकर जब उनकी सरकार “विकसित भारत 2047” की तरफ आगे बढ़ रही है और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा कर रही है।
काले धन पर नया सख्त कानून या संशोधन विदेशी खातों की नई सूची का सार्वजनिक खुलासा ईडी, इनकम टैक्स और एसआईटी द्वारा नए मामलों की छानबीन किसी प्रतीकात्मक बड़े नाम पर कार्रवाई, जिससे संदेश जाए कि सरकार गंभीर है।
