DB l मध्य प्रदेश की न्यायिक राजधानी जबलपुर एक बार फिर उपेक्षा का शिकार हो रही है। डुमना एयरपोर्ट से उड़ानों की लगातार घटती संख्या को लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि जबलपुर को ‘सेकेंड हैंड ट्रीटमेंट’ देना नाइंसाफी है। कोर्ट ने साफ किया कि यदि फ्लाइट्स नहीं बढ़ाईं गईं तो वे न्यायिक आदेश जारी करेंगे।
इस मामले में नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच और लॉ स्टूडेंट पार्थ श्रीवास्तव ने याचिका दायर कर जबलपुर से एयर कनेक्टिविटी बढ़ाने की मांग की थी। याचिका में कहा गया कि पहले जबलपुर से मुंबई, पुणे, कोलकाता और बेंगलुरु तक सीधी उड़ानें थीं, जो अब या तो बंद हो गई हैं या उनकी संख्या बेहद कम हो गई है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जबलपुर, जो राज्य की मुख्य न्यायिक पीठ है, उसके साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जा रहा है? क्या सिर्फ इसलिए कि यह प्रशासनिक राजधानी नहीं है?

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब हवाई सेवाएं ही नहीं देनी थीं तो डुमना एयरपोर्ट के विस्तार में 500 करोड़ रुपये क्यों खर्च किए गए? फिलहाल जबलपुर से केवल 9 उड़ानें संचालित हो रही हैं, जबकि इंदौर से 80, भोपाल से 40 और ग्वालियर से 25 फ्लाइट्स हर दिन उड़ान भर रही हैं। कोर्ट ने विमानन कंपनियों से भी जवाब मांगा है कि फ्लाइट बढ़ाने के लिए उन्हें क्या रियायतें चाहिए।
वकील आदित्य सांघी ने कोर्ट को बताया कि रीवा को ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट का दर्जा दिया गया है, जबकि जबलपुर को ब्राउन फील्ड में डालकर नजरअंदाज किया जा रहा है। कोर्ट ने असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल को आदेश दिया है कि अगली सुनवाई से पहले सभी पक्षों की संयुक्त बैठक कर हल निकाला जाए। अगली सुनवाई 6 नवम्बर को तय की गई है। लोगों का कहना है कि जबलपुर जैसे बड़े शहर की हवाई कनेक्टिविटी सुधारना सिर्फ पर्यटन नहीं, बल्कि व्यवसाय, स्वास्थ्य, शिक्षा और न्याय के लिए भी बेहद जरूरी है।
