DB l केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित नए विधेयकों ने देश की राजनीति में बड़ी बहस छेड़ दी है। सरकार लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने और संसद व विधानसभा में 33% महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में है। इसके लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026 समेत तीन अहम विधेयक संसद के विशेष सत्र में पेश किए जाएंगे।
इन प्रस्तावों का आधार 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम है, जिसमें महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था। अब सरकार इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिससे 2029 के आम चुनाव तक इसका असर दिख सकता है।
हालांकि, सबसे ज्यादा विवाद लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाने को लेकर हो रहा है। प्रस्ताव है कि 815 सीटें राज्यों से और 35 केंद्र शासित प्रदेशों से होंगी। परिसीमन की प्रक्रिया 2011 की जनगणना के आधार पर होगी, जिससे दक्षिणी राज्यों को अपने प्रतिनिधित्व में कमी का डर है। उनका तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उन्हें नुकसान हो सकता है।
वहीं, उत्तर भारत के बड़े राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार—में सीटों की संख्या काफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। अनुमान है कि उत्तर प्रदेश में सीटें 80 से बढ़कर 120 से ज्यादा हो सकती हैं।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी तेज है। एम. के. स्टालिन ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताया, जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह कदम चुनावी लाभ के लिए उठाया गया है। वहीं राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने इसे समय से पहले और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है।
महिला आरक्षण पर आम सहमति दिखती है, लेकिन इसे लागू करने के तरीके और समय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14% है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।
ऐसे में यह प्रस्ताव एक तरफ लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, तो दूसरी ओर इससे जुड़ी राजनीतिक और क्षेत्रीय असमानताओं को लेकर बहस तेज हो गई है। आने वाले दिनों में संसद में इस पर तीखी चर्चा देखने को मिल सकती है।
