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DB l जबलपुर। नर्मदा के तट पर बसे शहर के हजारों लोगों को आज भी स्वच्छ पेयजल नसीब नहीं हो पा रहा है।
नलों से घरों तक पहुंच रहा मटमैला, बदबूदार और संक्रमित पानी अब गंभीर चिंता का विषय बन गया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि इस मुद्दे पर अब मामला सीधे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। दूषित पेयजल आपूर्ति को लेकर जबलपुर की जल व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें नगर निगम जबलपुर, आयुक्त, महापौर, कलेक्टर, प्रमुख सचिव नगरीय प्रशासन और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को पक्षकार बनाया गया है।

यह जनहित याचिका तुलसी नगर निवासी अधिवक्ता ओपी यादव द्वारा दायर की गई है, जिनकी ओर से पैरवी अधिवक्ता रविंद्र गुप्ता कर रहे हैं। याचिका में बताया गया है कि चेरीताल, जयप्रकाश नगर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पिछले छह वर्षों से नलों में गंदा और संक्रमित पानी आ रहा है। कई स्थानों पर पानी की पाइपलाइनें नालों और नालियों से होकर गुजरती हैं, जिनमें लंबे समय से लीकेज है। बारिश के मौसम में स्थिति और भयावह हो जाती है, जब सीवेज मिला पानी सीधे पेयजल लाइनों में पहुंच जाता है।

नगर निगम का दावा है कि रमनगरा, ललपुर, भोंगाद्वार और रांझी वाटर फिल्टर प्लांट में पानी को केमिकल और मशीनरी प्रक्रिया से शुद्ध कर 23 बिंदुओं पर जांच के बाद सप्लाई किया जाता है। हालांकि जमीनी हकीकत इससे अलग है। लैब में पास होने वाला पानी जब जर्जर टंकियों और पुरानी पाइपलाइनों से होकर घरों तक पहुंचता है, तब उसकी गुणवत्ता गिर जाती है। कई इलाकों में टंकियों की वर्षों से सफाई नहीं हुई है।
इंदौर में दूषित पानी से 17 लोगों की मौत के बाद नगर निगम ने जांच तेज की है। जनवरी के पहले सप्ताह में ललपुर प्लांट से 312 सैंपल लिए गए, जो जांच में मानक स्तर के पाए गए, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि वितरण प्रणाली ही सबसे बड़ी समस्या है। शहर के कई क्षेत्रों में पानी में टीडीएस की मात्रा 600 से ऊपर पाई गई है, जबकि डब्ल्यूएचओ के अनुसार 300 से कम टीडीएस वाला पानी ही उत्तम माना जाता है।
