DB। संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें भारत समेत 142 देशों ने फ़लस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देने और इज़राइल-फ़लस्तीन विवाद को हल करने के लिए दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया। इस प्रस्ताव, जिसे न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन कहा गया, का उद्देश्य दशकों पुराने संघर्ष को समाप्त कर शांति की दिशा में ठोस कदम उठाना है। इसके पक्ष में 142 वोट पड़े, जबकि 10 देशों ने विरोध किया और 12 देशों ने मतदान से दूरी बनाई। अमेरिका और इज़राइल ने इसका कड़ा विरोध किया।

भारत का रुख इस मुद्दे पर हमेशा स्पष्ट रहा है। स्वतंत्र फ़लस्तीन राष्ट्र की स्थापना के समर्थन को भारत अपनी विदेश नीति का अभिन्न हिस्सा मानता है। 1974 में भारत फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को मान्यता देने वाला पहला ग़ैर-अरब देश बना था और 1988 में फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में शामिल हुआ था। यही नहीं, भारत ने ग़ज़ा और रामल्ला में अपने प्रतिनिधि कार्यालय भी स्थापित किए और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फ़लस्तीनी आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया।
इस बार लाए गए न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन में युद्धविराम, ग़ज़ा में मानवीय हालात सुधारने और भविष्य में फ़लस्तीनी अथॉरिटी को पूरे क्षेत्र का प्रशासन सौंपने की बात कही गई है। इसमें हमास के शासन को समाप्त करने और हथियार फ़लस्तीनी अथॉरिटी को सौंपने की भी मांग शामिल है। प्रस्ताव में 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास हमले और इज़राइल द्वारा ग़ज़ा में की गई बमबारी, घेराबंदी और मानवीय संकट—दोनों की आलोचना की गई। फ़िलिस्तीनी राजदूत रियाद मंसूर ने इस समर्थन को “शांति की उम्मीद” बताया और कहा कि यह पूरी दुनिया की ख्वाहिश को दर्शाता है।
दूसरी ओर, इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि “फ़लस्तीनी राष्ट्र कभी नहीं बनेगा, यह ज़मीन हमारी है।” इज़राइल के संयुक्त राष्ट्र राजदूत डैनी डैनन ने इसे “नाटक” करार देते हुए कहा कि यह केवल हमास को फायदा पहुंचाएगा। अमेरिका ने भी इसे “गलत समय पर किया गया राजनीतिक स्टंट” बताया।

भारत के लिए यह कदम कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कुछ महीनों पहले जब ग़ज़ा युद्धविराम को लेकर प्रस्ताव आया था, भारत ने मतदान से दूरी बनाई थी, जिस पर विपक्ष ने आलोचना की थी। लेकिन अब भारत का समर्थन स्पष्ट संदेश देता है कि वह फ़लस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय, संप्रभुता और स्वतंत्र राष्ट्र की आकांक्षा के साथ खड़ा है।
इस समय 145 से अधिक देश फ़लस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे चुके हैं। फ़्रांस, स्पेन, आयरलैंड और नॉर्वे जैसे यूरोपीय देशों ने भी इस दिशा में ठोस क़दम उठाने की घोषणा की है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि मध्य-पूर्व में स्थायी शांति के लिए दो-राष्ट्र समाधान ही मुख्य राह है।
भारत का यह रुख न केवल उसकी दशकों पुरानी विदेश नीति की निरंतरता है बल्कि फ़लस्तीनी जनता के लिए शांति और न्याय की उम्मीद को भी मज़बूती देता है। यह कदम आने वाले समय में भारत की पश्चिम एशिया में भूमिका को और प्रासंगिक बना सकता है।
