एमपी हाईकोर्ट ने दोषी को अनोखी सजा दी: रोपने होंगे 50 स्वदेशी पौधे
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर ने एक शख्स को आपराधिक अवमानना मामले में अनोखी सजा सुनाई है। जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने शख्स को एक महीने के भीतर देशी प्रजाति के 50 पेड़ लगाने का आदेश दिया है। साथ ही मामले में उसकी माफी स्वीकार कर ली है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक आपराधिक अवमानना प्रकरण में दोषी पाए गए एक युवक को सजा के रूप में समाज सेवा का आदेश दिया है। युवक को 50 स्वदेशी प्रजाति के पौधे लगाने होंगे। यह सजा सुधारात्मक दृष्टिकोण और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से दी गई है।
राहुल की पत्नी पूजा राठौर ने भरण-पोषण मामले के दौरान कोर्ट को सूचित किया कि राहुल ने सोशल मीडिया पर उनके और न्यायालय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की है।
न्यायालय ने इसे गंभीरता से लेते हुए राहुल के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मामला हाई कोर्ट को संदर्भित कर दिया।
हाई कोर्ट की कार्रवाई
हाई कोर्ट ने राहुल को कारण बताओ नोटिस जारी किया, लेकिन उसने न तो जवाब दिया और न ही कोर्ट में उपस्थिति दर्ज कराई।
युगलपीठ ने सजा के सिलसिले में सुझाव मांगा
न्यायालय ने इस जानकारी को अभिलेख पर लेकर आरोपित राहुल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया, लेकिन न तो आरोपित की ओर से जवाब प्रस्तुत किया गया और न ही वह उपस्थिति हुआ। इस रवैये को पर आपराधिक अवमानना प्रकरण चलाने के लिए न्यायालय ने हाई कोर्ट को पत्र भेज दिया। प्रकरण हाई कोर्ट में सुनवाई में आया तो कोर्ट रूम में उपस्थित अधिवक्ता आदित्य संघी से युगलपीठ ने सजा के सिलसिले में सुझाव मांगा।
अधिवक्ता ने कहा कि सुझाव दिया कि आरोपित की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसे सुधारात्मक रूप से प्रतीकात्मक सजा दी जा सकती है। इसके अंतर्गत समाज सेवा करना बेहतर होगा। मसलन, भंवरताल पार्क में पौधारोपण कराया जाए। हाई कोर्ट को यह सुझाव पसंद आया।
अधिवक्ता आदित्य संघी ने सुझाव दिया कि आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रतीकात्मक सजा दी जाए।
समाज सेवा के अंतर्गत पौधारोपण कराने का सुझाव दिया गया, जिसे हाई कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
सजा का आदेश
हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने राहुल को 50 स्वदेशी प्रजाति के पौधे लगाने का आदेश दिया।
पौधारोपण स्थल: यह कार्य समाज हित में सार्वजनिक स्थान पर किया जाएगा।
प्रतीकात्मक सजा का उद्देश्य:
दोषी को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना।
समाज सेवा के माध्यम से सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाना।
सजा की विशेषता
यह सजा न केवल दोषी को सुधारने का प्रयास है, बल्कि समाज को पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित करने का भी एक उदाहरण है। हाई कोर्ट का यह निर्णय पारंपरिक दंड प्रक्रिया से हटकर सुधारात्मक और प्रगतिशील दृष्टिकोण को दर्शाता है।