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राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। यह कदम संसदीय लोकतंत्र में एक अभूतपूर्व घटना के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि राज्यसभा के इतिहास में सभापति के खिलाफ इस प्रकार का कदम बहुत ही दुर्लभ है।

अविश्वास प्रस्ताव का कारण
विपक्ष का मुख्य आरोप है कि जगदीप धनखड़ सदन की कार्यवाही में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि “इंडिया” गठबंधन के सभी दलों के लिए यह फैसला लेना कठिन था, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के लिए इसे जरूरी समझा गया।
पहले जानिए अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया क्या है?
राज्यसभा में सभापति के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 67-a के तहत अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है. अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सांसदों का हस्ताक्षर जरूरी है. अविश्वास प्रस्ताव राज्यसभा के महासचिव को सौंपा जाता है, जिसे सभापति को सूचना देकर सदन के पटल पर लाया जाता है.

राज्यसभा में जब अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस आता है, तो सभी सांसद पहले इस पर बोलते हैं और फिर मतदान कराया जाता है. राज्यसभा में मतदान के बाद इसे लोकसभा में भेज दिया जाता है. लोकसभा में भी इस प्रस्ताव पर पहले बहस कराई जाती है और फिर वोटिंग की प्रक्रिया पूरी की जाती है.
दोनों जगहों पर प्रस्ताव पास होने की स्थिति में सभापति को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ती है.
अब जानिए राज्यसभा और लोकसभा का नंबर गेम
राज्यसभा के सभापति देश के उपराष्ट्रपति होते हैं, इसलिए उन्हें हटाने के लिए दोनों सदनों में साधारण बहुमत की जरूरत होती है. लोकसभा में अभी 543 सदस्य हैं, जहां सत्ता पक्ष के पास कुल 293 सांसद हैं.

विपक्ष को 249 सांसदों का समर्थन प्राप्त है, जो 272 के बहुमत के आंकड़े से करीब 23 कम है. सत्ता पक्ष के समर्थन में जो भी दल अभी है, उसमें से किसी की भी नाराजगी की खबर नहीं है. ऐसे में लोकसभा में शायद ही धनखड़ के खिलाफ प्रस्ताव पास हो सके.

बात राज्यसभा की करें तो राज्यसभा में वर्तमान में एनडीए गठबंधन के पास पूर्ण बहुमत है. विपक्ष 100 के आंकड़े के करीब ही है. राज्यसभा में अभी भी मनोनीत सांसदों के 4 पद रिक्त हैं. वहीं 6 सीटों के लिए उपचुनाव हो रहे हैं, जहां 5 पर एनडीए की जीत तय है.

राज्यसभा में कुल 245 सदस्य होते हैं, जहां बहुमत के लिए 123 सदस्यों की जरूरत होती है. अकेले बीजेपी के पास 95 सदस्य हैं. जेडीयू के पास 4 सदस्य है. 6 मनोनीत सांसद हैं, जो आम तौर पर सरकार का ही समर्थन करते हैं.

कुल आंकड़े अगर देखा जाए तो अभी एनडीए के पास 125 सांसदों का समर्थन है. इसके अलावा बीजेडी के 7 और वाईएसआर के 8 सांसद ऐसे हैं, जो इंडिया गठबंधन के विरोध में रहते हैं.
फिर विपक्ष ने क्यों दिया नोटिस?
पहला कारण- सदन में बोलने का मौका मिलेगा
संसद के शीतकालीन सत्र में अब तक विपक्ष को किसी भी बड़े मुद्दे पर बोलने का मौका नहीं मिला है. अगर जगदीप धनखड़ के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस कराई जाती है तो सभी पार्टियों के लोकसभा और राज्यसभा के कुछ सांसदों को इस पर बोलने का मौका मिल सकता है.

राज्यसभा में बहस के दौरान सभापति अपने चेयर पर नहीं होंगे. ऐसे में विपक्ष के सांसद और खुलकर उनके खिलाफ अपनी बातें रख सकते हैं. साथ ही उन मुद्दों को भी उठा सकते हैं, जिस पर सदन में बहस नहीं हो पा रही है.

इनमें उद्योगपति गौतम अडानी का मुद्दा प्रमुख है. कांग्रेस लंबे वक्त से राज्यसभा और लोकसभा में इस मुद्दे पर बहस की डिमांड कर रही है, लेकिन नियमों का हवाला देकर इसे बहस के विषय में शामिल नहीं कराया जा रहा है.
प्रस्ताव की प्रक्रिया
विपक्षी दलों ने यह प्रस्ताव राज्यसभा के महासचिव को सौंपा है।
यह प्रस्ताव आगे राज्यसभा में चर्चा और मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।
प्रस्ताव पारित होने के लिए राज्यसभा के बहुमत का समर्थन जरूरी होगा।
राजनीतिक विश्लेषण
यह अविश्वास प्रस्ताव विपक्षी एकता को प्रदर्शित करता है।
यह केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव का संकेत है।
सभापति पर पक्षपात के आरोप से संसदीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

संसद के मौजूदा सत्र की शुरुआत से ही सदन में भारत के जाने माने कारोबारी गौतम अदानी और अन्य कई मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध जारी है. इस सत्र की शुरुआत से ठीक पहले ही गौतम अदानी पर अमेरिका में धोखाधड़ी के आरोप तय किए जाने की ख़बर आई थी.

उसके बाद से ही कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर है. कांग्रेस पार्टी पहले भी कई मुद्दों को लेकर अदानी के मसले पर जेपीसी की मांग करती रही है.

जयराम रमेश ने कहा कि राज्यसभा के गठन हुए 72 साल हो गए हैं और पहली बार राज्यसभा के सभापति के ख़िलाफ़ प्रस्ताव सौंपा गया है, जो दिखाता है कि हालात कितने बिगड़ गए हैं.
बीजेपी सांसद और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है, “मैं एक बार फिर से स्पष्ट तौर पर कह रहा हूं कि एक बार जब संसद सुचारू तौर पर चल रही है तो कांग्रेस पार्टी ने किस वजह से ड्रामा शुरू किया? ऐसे मास्क और जैकेट पहनकर आने कि क्या ज़रूरत है जिसपर स्लोगन लिखे हुए हों…?
रिजिजू ने कहा है, “हम यहां देश की सेवा करने के लिए आए हैं, इस तरह का ड्रामा देखने के लिए नहीं आए हैं. जो नोटिस कांग्रेस पार्टी और उसके कुछ सहयोगियों ने दिया है, उसे निश्चित तौर पर नामंज़ूर किया जाना चाहिए और उसे नामंज़ूर किया जाएगा.”
इस बीच भारतीय संविधान में दिए गए प्रावधानों की बात करें तो संविधान में राष्ट्रपति को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया की विस्तार से चर्चा की गई है.
उपराष्ट्रपति जो कि राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, उन्हें हटाने की प्रकिया और इसका आधार क्या होता है, इसे जानने के लिए बीबीसी ने कुछ संविधान विशेषज्ञों से बात की है.
विपक्ष द्वारा राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के पीछे मुख्य उद्देश्य राजनीतिक संदेश देना और सरकार की कार्यशैली को चुनौती देना हो सकता है। हालांकि, संवैधानिक और राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रस्ताव विपक्ष के लिए व्यावहारिक लाभ नहीं ला पाएगा।

विपक्ष को संभावित लाभ
राजनीतिक संदेश:

यह कदम विपक्षी दलों की एकजुटता को प्रदर्शित करता है।
इससे विपक्ष यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय प्रक्रिया की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।
जनता का ध्यान आकर्षित करना:

विपक्ष सरकार और राज्यसभा सभापति पर आरोप लगाकर जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है।
यह कदम राजनीतिक दबाव बनाने का हिस्सा हो सकता है।
भविष्य की रणनीति:

यह पहल विपक्ष के लिए भविष्य में संसद के भीतर और बाहर अपनी रणनीतियों को मजबूत करने का आधार बन सकती है।
सीमित प्रभाव
संसद में संख्या बल की कमी:
विपक्ष के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, जिससे इस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना नगण्य है।

प्रक्रियात्मक बाधाएं:

संविधान के तहत राज्यसभा सभापति को हटाने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य है।
संसद सत्र 20 तारीख़ को समाप्त हो रहा है, जिससे इस प्रस्ताव पर चर्चा की संभावना सीमित हो जाती है।
विशेषज्ञों की राय
फैज़ान मुस्तफ़ा जैसे संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि:

उपराष्ट्रपति के खिलाफ इस तरह की प्रक्रिया को व्यावहारिक समर्थन नहीं मिलेगा।
राज्यसभा सभापति को भी सदन की कार्यवाही में सभी पक्षों को साथ लेकर चलना चाहिए।
उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए केवल सदन का विश्वास खोना पर्याप्त होता है, लेकिन इसे साबित करना राजनीतिक रूप से कठिन है।

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