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DB । जबलपुर। कैंसर जैसे गंभीर रोग में समय पर जांच और उपचार बेहद जरूरी होता है, लेकिन नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत संचालित स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (SCI) में मरीजों को अब भी कई जरूरी सुविधाओं का इंतजार है। करीब 150 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किए गए इस संस्थान से उम्मीद थी कि जबलपुर सहित आसपास के आठ जिलों के मरीजों को कैंसर का समुचित इलाज एक ही स्थान पर मिल सकेगा। हालांकि, तीन साल से अधिक समय बीतने के बाद भी संस्थान पूरी क्षमता से संचालित नहीं हो पा रहा है।
लीनियर एक्सीलरेटर का इंतजार
कैंसर के रेडिएशन उपचार के लिए जरूरी लीनियर एक्सीलरेटर मशीन अभी तक उपलब्ध नहीं है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन के अनुसार इस साल दिसंबर तक मशीन मिलने की उम्मीद है। करीब 42 करोड़ रुपये की लागत वाली मशीन जर्मनी से मंगाई जानी प्रस्तावित है और इसके लिए बजट को मंजूरी मिल चुकी है।

डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की कमी
संस्थान में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भी कमी बनी हुई है। करीब 16 विशेषज्ञों की आवश्यकता के मुकाबले फिलहाल चार आन्कोलॉजिस्ट सहित सात-आठ विशेषज्ञ ही उपलब्ध बताए जा रहे हैं। नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण कीमो वार्ड में एक नर्स पर करीब 15 मरीजों की जिम्मेदारी होने की बात सामने आई है।
मरीजों का इलाज दूसरे शहरों में
पिछले वर्ष करीब 6,400 मरीजों ने पंजीयन कराया, लेकिन इनमें से लगभग 2,100 मरीजों को ही पूरा इलाज मिल सका। करीब 4,300 मरीजों को उपचार के लिए दूसरे शहरों या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ा। जरूरी कीमो दवाओं की उपलब्धता भी कई बार प्रभावित होने की शिकायत है।
कई जरूरी मशीनें अब भी लंबित
संस्थान को लीनियर एक्सीलरेटर के अलावा फ्लो साइटोमीटर, सीटी सिम्युलेटर, क्यूए टूल्स, मेमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड और आन्को सर्जरी उपकरणों की भी जरूरत है। इनकी खरीदी के लिए शुरू हुई टेंडर प्रक्रिया कई बार निरस्त होने और प्रशासनिक बदलावों के कारण प्रक्रिया प्रभावित हुई।
दरअसल, स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की घोषणा 2014-15 में हुई थी। भवन निर्माण में भी लंबा समय लगा और वर्ष 2023 में संस्थान की शुरुआत हुई। लेकिन संसाधनों की कमी के कारण आज भी मरीजों को वह सुविधा नहीं मिल पा रही, जिसकी उम्मीद इतने बड़े निवेश के साथ की गई थी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 150 करोड़ की लागत वाला संस्थान कब पूरी क्षमता से मरीजों के काम आएगा?
